
बेलादुला के श्मशान घाट में किया बेटी ने माँ का अंतिम संस्कार, इसके पहले। ही गांव में बेटियों ने बेटे का फर्ज निभाया है
जिला संवाददाता डॉ राम कुमार मनहर
बेलादुला, बेटी ने मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि बदलती सोच और बेटियों की ताकत की मिसाल है। गरीब की पीड़ा को अनदेखा कर हम अपनी इंसानियत खो रहे हैं। मामला छत्तीसगढ़ के सकती जिला के जैजैपुर के ग्राम पंचायत बेलादुला के गंगा बाई कुर्रे का निधन विगत दिनों हो गया है जिसका कोई बेटा नहीं है लेकिन अंतिम समय में बेटी कर्मा बाई मनहर, नाती डॉ राम कुमार मनहर सहित परिवार जन के मौजुदगी में मुखाग्नि देकर बेटा न धर्म निभाया
अब जरूरत है कि हम सब आगे आएं, सहयोग और सम्मान के साथ। ताकि कोई भी बेटी अपनी मां को अकेले न विदा करे और किसी के दरवाजे पर शव इंतजार न करे। जब बेटा न हो या परिवार में कोई पुरुष न हो, तब कई साहसी बेटियां आगे आकर अपनी मां को कंधा देती हैं और मुखाग्नि देकर पुत्र धर्म व बेटे का फर्ज निभाती हैं। यह बदलती सोच और समाज में बेटियों के साहस का प्रतीक है।

अब समाज में यह पुरानी सोच बदल रही है कि केवल बेटे ही अंतिम संस्कार कर सकते हैं। कई स्थानों पर बेटियों ने अर्थी को कंधा देकर और मुखाग्नि देकर यह साबित कर दिया है कि वे किसी भी जिम्मेदारी में पीछे नहीं हैं कई स्थानों पर बेटियों ने अर्थी को कंधा देकर और मुखाग्नि देकर यह साबित कर दिया है कि वे किसी भी जिम्मेदारी में पीछे नहीं हैं ऐसी घटनाएं समाज को एक सकारात्मक संदेश देती हैं कि माता-पिता के प्रति प्रेम और कर्तव्य का अधिकार हर संतान का है, चाहे वह बेटा हो या बेटी

समय बदल रहा है… सोच भी बदलनी चाहिए। “एक बेटी… जिसने माँ की हर सांस को महसूस किया,
क्या उसे अपनी ही माँ को अंतिम विदाई देने का हक नहीं?” समाज के कुछ रिवाज़ आज भी बेटियों को उनके हक से दूर रखते हैं। लेकिन सच ये है — रिश्ते खून से नहीं, अपनापन और प्रेम से बनते हैं। बेटी भी उतनी ही हकदार है, जितना कोई बेटा… माँ को अंतिम विदाई देने के लिए, उस प्यार को पूरा करने के लिए। आज का ये विचार, हर उस बेटी के नाम… जो अपने हक और सम्मान के लिए खड़ी है। 🤍











