
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, WhatsApp पर छुट्टी मांगने और जवाब में बॉस का ‘OK’ मिलने को मंजूरी समझना उत्तर मध्य रेलवे के एक कर्मचारी को भारी पड़ गया। कर्मचारी ने दो दिन की अतिरिक्त छुट्टी लेने के बाद अपने तबादले को चुनौती दी थी। हालांकि, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) की इलाहाबाद पीठ ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर मध्य रेलवे में कार्यरत प्रिय रंजन कुमार ने 14 से 16 जुलाई 2025 तक अपने पैतृक गांव जाने के लिए तीन दिन का अवकाश लिया था। इसके बाद उन्होंने 16 जुलाई को WhatsApp के जरिए 17 और 18 जुलाई के लिए दो दिन की अतिरिक्त छुट्टी मांगी।
कर्मचारी का दावा था कि वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक (कोचिंग) हिमांशु शुक्ला ने उनके संदेश के जवाब में ‘OK’ लिखा था। कर्मचारी ने इसे छुट्टी की स्वीकृति समझ लिया। लेकिन रेलवे प्रशासन का पक्ष था कि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार छुट्टी की औपचारिक मंजूरी नहीं मिली थी।
ड्यूटी पर लौटे तो निलंबन, फिर हुआ तबादला
रिपोर्ट के मुताबिक, 21 जुलाई 2025 को ड्यूटी पर लौटने के बाद कर्मचारी को निलंबित कर दिया गया। इसके बाद 25 जुलाई को उनका तबादला प्रयागराज से फतेहपुर कर दिया गया। 28 जुलाई को उन्हें कार्यमुक्त किया गया और 31 जुलाई को विभागीय आरोपपत्र भी जारी हुआ।
कर्मचारी ने आरोप लगाया कि छुट्टी को लेकर हुए विवाद के कारण उनका तबादला दंडात्मक कार्रवाई के तौर पर किया गया। उन्होंने तबादले को चुनौती देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। 
रेलवे ने क्या दलील दी?
रेलवे प्रशासन ने ट्रिब्यूनल में कहा कि फतेहपुर रेलवे स्टेशन पर नए प्रवेश द्वार और बुकिंग कार्यालय के विकास के कारण कर्मचारियों की आवश्यकता थी। प्रशासन के अनुसार, तबादला इसी जरूरत के मद्देनजर किया गया था।
रेलवे ने यह भी दलील दी कि संबंधित अवधि में विभाग का प्रशासनिक काम दूसरे अधिकारी के पास था और छुट्टी के लिए निर्धारित HRMS पोर्टल के माध्यम से आवेदन एवं स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी।
ट्रिब्यूनल ने क्या कहा?
7 अक्टूबर 2026 के आदेश में न्यायिक सदस्य रजनीश कुमार राय की पीठ ने स्पष्ट किया कि WhatsApp पर अधिकारी का ‘OK’ जवाब अपने आप में सक्षम प्राधिकारी द्वारा छुट्टी मंजूर किए जाने का निर्णायक प्रमाण नहीं है।
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि रेलवे ने फतेहपुर में तबादले के लिए स्वतंत्र प्रशासनिक कारण प्रस्तुत किए थे। कर्मचारी अपने तबादले के पीछे दुर्भावना या दंडात्मक मंशा को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सके। इसी आधार पर उनकी याचिका खारिज कर दी गई।
कर्मचारियों के लिए क्या है सबक?
यह मामला बताता है कि सरकारी सेवा में छुट्टी मांगने और छुट्टी की औपचारिक स्वीकृति मिलने के बीच अंतर हो सकता है। केवल मैसेज का जवाब देखकर छुट्टी को अंतिम रूप से मंजूर मान लेना जोखिम भरा हो सकता है, खासकर जब विभाग में निर्धारित पोर्टल या औपचारिक प्रक्रिया लागू हो।
ध्यान देने वाली बात: ट्रिब्यूनल का फैसला यह नहीं कहता कि WhatsApp पर दी गई मंजूरी हर परिस्थिति में अमान्य है। इस मामले में पीठ ने पाया कि केवल ‘OK’ संदेश से सक्षम अधिकारी की औपचारिक स्वीकृति साबित नहीं हुई।











